दिल्ली तक गूंजी डिंडोरी की आवाज अपर बुढ़नेर वृहद बांध परियोजना पर केंद्र सरकार सख्त
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इंजीनियर फूल सिंह मरकाम सरपंच संघ जिला अध्यक्ष की शिकायत पर जनजातीय कार्य मंत्रालय ने मांगी कार्रवाई रिपोर्ट
बलराम राजपूत न्यूज डिण्डौरी
मंडला-डिंडोरी के आदिवासी अंचल में प्रस्तावित अपर बुढ़नेर वृहद बांध परियोजना अब राष्ट्रीय स्तर का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। आदिवासी गांवों के डूबने और ग्राम सभाओं की सहमति के बिना परियोजना को आगे बढ़ाने के आरोपों के बीच भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) ने मामले में सीधा हस्तक्षेप किया है।
जिला सरपंच संघ डिंडोरी के संभाग प्रमुख इंजी. फूल सिंह मरकाम द्वारा भेजे गए प्रतिवेदन के बाद मंत्रालय ने 21 मई 2026 को मध्यप्रदेश शासन को आधिकारिक पत्र जारी कर पूरे मामले की जांच और वैधानिक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
केंद्र सरकार के पत्र में साफ उल्लेख किया गया हैं , कि अपर बुढ़नेर बांध सहित तीन परियोजनाओं के कारण मंडला-डिंडोरी के 22 अनुसूचित जनजाति गांव एवं 1 वन ग्राम के डूब क्षेत्र में आने की आशंका है। साथ ही यह भी आरोप है कि प्रभावित आदिवासी समुदायों की सहमति लिए बिना परियोजनाओं को मंजूरी दी गई।
जल-जंगल-जमीन बचाने की लड़ाई
इंजी. फूल सिंह मरकाम ने अपने ज्ञापन में कहा कि यह केवल बांध का मामला नहीं बल्कि आदिवासी अस्तित्व, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न है। उन्होंने आरोप लगाया कि ग्राम सभाओं को विश्वास में लिए बिना परियोजना आगे बढ़ाई जा रही है, जो Forest Rights Act (FRA) और PESA Act की मूल भावना के खिलाफ है।
मरकाम ने कहा कि यदि परियोजना इसी प्रकार लागू हुई तो हजारों आदिवासी परिवार अपनी जमीन, जंगल, नदी, देवस्थल और पुरखों की विरासत से हमेशा के लिए बेदखल हो जाएंगे।
केंद्र सरकार ने कहा — नियमों के अनुसार करें कार्रवाई
भारत सरकार के मंत्रालय ने अपने पत्र में मध्यप्रदेश शासन से कहा हैं ,कि मामले की जांच Forest Rights Act और RFCTLARR Act 2013 के तहत की जाए तथा सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित किया जाए।
इस पत्र की प्रतिलिपि मंडला और डिंडोरी कलेक्टर को भी भेजी गई है, जिससे प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। अब जिला स्तरीय समिति (DLC) की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
आदिवासी अंचल में उबाल
केंद्र सरकार द्वारा संज्ञान लेने के बाद प्रभावित क्षेत्रों में आंदोलन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई ग्राम सभाओं और सामाजिक संगठनों ने इसे आदिवासी समाज की बड़ी जीत बताया हैं। ग्रामीणों का कहना हैं , कि विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी जमीन और संस्कृति से अलग नहीं किया जा सकता।
स्थानीय लोगों का कहना हैं , कि
> “पहले जंगल छीने गए, फिर जमीनें गईं, अब गांव डुबाने की तैयारी है। आदिवासी समाज अब चुप नहीं बैठेगा।”
संवैधानिक अधिकारों का बड़ा सवाल
जानकारों के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी बड़ी परियोजना के लिए ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य मानी जाती है। यदि बिना सहमति के स्वीकृति दी गई है तो यह गंभीर कानूनी और संवैधानिक प्रश्न बन सकता है।
अपर बुढ़नेर वृहद बांध परियोजना अब केवल एक निर्माण कार्य नहीं बल्कि जल-जंगल-जमीन, आदिवासी अधिकार और संविधान बचाने की लड़ाई का प्रतीक बनती जा रही है। डिंडोरी से उठी यह आवाज अब दिल्ली के सत्ता गलियारों तक पहुंच चुकी है।
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